पता नहीं
पता नहीं.... कुछ उलझी सी कुछ सुलझी सी कुछ समझाती सी कुछ झुठलाती सी | पार्थ को जब पता नहीं यह पत्र किसे पहुँचाए , पते पर जा पता चला यहीं हैं वो " पता नई "| पता नहीं के कुछ प्रश्न को जब पता कर बतलाया , यह पाठ पढ़कर, पार्थ को विद्वान सा बनाया | पत ( Respect ) की खोज में जब पाठक यह सबको समझा ना पाया , " पता नहीं " कि ऐसी माया, पथ पर कैसे सबको विश्वास दिलाया ? पठ से भ्रमित होना कैसे सबको भाया ?? " पता नहीं " था होशियार प्रत्याय के समान रूप धर्ता सार | पार्थ को अब समज हैं आया पता नहीं की अद्भूत काया, हर वक़्त बदले वो कहानीकार की छाया | = Chilledsup♾️🥰